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RANGVARTA : an e-magazine for Indian Theatre                                                       back to main stage


पुरस्कार तब मिला जब मैं थक गया हूं...
मुझे यह पुरस्कार तब मिला है जब मैं थक कर बैठ गया हूं। इस सफर में कई दुश्वारियां आईं। देर आए लेकिन, दुरुस्त आए। यह कहना था कि रियासत के थियेटर खासकर लोक थियेटर में अपनी अलग पहचान रखने वाले मोती लाल खेमू का। पद्मश्री मिलने के बाद खेमू ने यह बातें कहीं। खेमू कश्मीरी थिएटर के सुपरिचित और बहुचर्चित नाम हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया से अंदाज लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाषायी संस्कृतिकर्मियों को किस तरह से उपेक्षित किया जाता रहा है।
Posted on 28 Jan 2012 by rang
गुरिल्ला स्त्रियों का छापामार थिएटर
थिएटर के जरिए फासिस्ट ताकतों का मुकाबला करने वाले ब्रेख्त के बारे में बताने की जरूरत नहीं है जिन्होंने तानाशाह सैनिक शासन और रंगभेद के खिलाफ गुरिल्ला थिएटर किया। लेकिन नई सदी के इस पहले दशक में औरतों ने एक ऐसा थिएटर समूह बनाया है जो ब्रेख्त की तरह छापामार थिएटर कर रहा है। गुरिल्ला औरतों का यह थिएटर ब्रेख्त से इस मायने में भिन्न है कि जहां वे सिर्फ अपने देश में रंगमंच करते थे, वहीं ये पूरी दुनिया में घूम-घूमकर थिएटर कर रही हैं।
अभिषेक कृष्ण
Posted on 08 Jan 2012 by rang
नेपथ्य में चला गया एक 'हरफनमौला'
सोफोक्लीज द्वारा 442 ईसापूर्व के करीब लिखे गए ग्रीक दुखांत नाटक 'एंटीगॉन' का पूर्वाभ्यास शुरू हो चुका है। 'किंग क्रेऑन' की भूमिका निभाने वाले नसीरुद्दीन शाह अपनी भूमिका में तल्लीन हैं। रत्ना पाठक शाह भी रिहर्सल कर रही हैं जो एंटीगॉन का किरदार निभा रही हैं। अचानक एक कड़कती हुर्ई आवाज गूंजती है, 'आप स्टेज पर पति और पत्नी नहीं हैं। मत भूलिए कि आप दोनों चाचा-भतीजी की भूमिका निभा रहे हैं। आप दोनों को ज्यादा करीब नहीं होना चाहिए।'
-वीनू संधू
Posted on 04 Jan 2012 by rang
एंजोय डर्टी पिक्चर, वी कांट टॉलरेट लौंडा
इस 18 दिसंबर से भिखारी ठाकुर की 125वीं जयंती की शुरुआत हो रही है. यह समय ऐसा है जिसमें डर्टी विजुअलों की भरमार है चाहे माध्यम टीवी, सिनेमा, डिजिटल होर्डिंग, एलबम कुछ भी हो. इन सबके बीच नौटंकी, लौंडा नाच और इनके सिरमौर भिखारी ठाकुर की प्रासंगिकता क्या है? नचनिया-बजनिया और रंगकर्मी समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति व हैसियत ग्लोबल बाजार में कितनी है?
- अश्विनी कुमार पंकज
Posted on 18 Dec 2011 by rang
रंगकर्म आजीविका और प्रसिद्धि दे सकता है : संजय उपाध्याय
पिछले तीस सालों में पूरे परिदृश्य में काफी बदलाव आया है और अब वह वैश्विक हो गया है। नाटक के तत्व भी बदल गए हैं और सब कुछ डिजिटल हो गया है। आज थिएटर में पैसा भी मिलने लगा है जिसके बारे में हमलोगों ने कभी नहीं सोचा था। रंगमंच में अवधारणा और प्रतिबद्धता के स्तर पर भी बड़ा बदलाव देखने में आ रहा है। वह बाजार की तरफ उन्मुख हुआ है। बहुत से रंगकर्मी रंगकर्म के सहारे आजीविका जुटा पा रहे हैं।
- संजय उपाध्याय
Posted on 12 Dec 2011 by rang
‘कहानी का रंगमंच’ की वर्गीय प्रस्तुति
देवेन्द्र राज अंकुर का एक इंटरव्यू एनएसडी के रंगमंडल में कार्यरत और वहीं के प्रशिक्षित पुंज प्रकाश ने अपने ब्लॉग/फेसबुक पर पोस्ट किया है। यह इंटरव्यू वर्चुअल दुनिया में उस समय आया है जब एनएसडी के शशिभूषण की दूसरी पुण्यतिथि पर पटना में आयोजित स्मृति समारोह के दौरान लोगों ने फेसबुक पर तीखे सवाल उठाए हैं। न्याय की मांग कर रहे रंगकर्मियों और फेसबुक पर इस संदर्भ में उठे तीखे सवालों का क्या उपरोक्त पोस्ट से कोई सीधा संबंध है?
- अश्विनी कुमार पंकज
Posted on 12 Nov 2011 by rang
जिंदगी एक नाटक घर है
पिता ट्रकों के जरिए माल ढुलाई का काम करते थे। बड़ा होने पर मैं भी उनके साथ इस काम में लग गया। इस सिलसिले में बंगलौर, मुंबई, सूरत, बड़ौदा हिंदुस्तान भर में कई जगह गया, लेकिन दिल हमेशा कागज-कलम में ही अटका रहा। वक्त के साथ जिंदगी को देखा, सोचा, समझा, कहानी, कविताओं, अफसानों मे ढाला। धीरे-धीरे रूझान नाटकों की ओर ज्यादा हुआ। लेखन के 48 साल के सफर में करीब 75-80 नाटक लिखे, जिनके 100 से भी ज्यादा शो हुए।
- रिजवान जहीर उस्मान
Posted on 23 Sep 2011 by rang
हिन्दी के चलते हिन्दी पेशेवर रंगमंच असंभव है
जयशंकर प्रसाद मानते थे कि वे अवाम के स्तर तक नहीं जाएंगे, अवाम उन तक आये. आखिर गालिब ने यह क्यों नहीं कहा था और अवाम में उनकी पैठ प्रसाद से हजार गुना क्यों हुई? हिन्दी क्षेत्र में एक और रंगचर्या जनमी और अत्यधिक लोकप्रिय हुई और आज भी है- नौटंकी. नौटंकी उर्दू भाषा का रंगान्दोलन है और पारसी रंगमंच की तरह ही लोकप्रिय. इसका श्रेय भी उर्दू को जाएगा. हमें समझना होगा कि हिन्दी के चलते हिन्दी पेशेवर रंगमंच असंभव है.
- मुद्राराक्षस
Posted on 08 Aug 2011 by rang
यह बंगाल के जात्रा रंगमंच का जादू है
हिंदी रंगमंच क्या कभी बंगाल के ‘जात्रा’ रंगमंच की तरह पॉपुलर हो पाएगा? जब नामी-गिरामी कलाकार दर्शकों के लिए हिंदी रंगमंच पर उतरेंगे। वह भी चर्चित फिल्म सेलेब्रटिज और स्टार। हिंदी रंगमंच पर अभी तक वही फिल्मी कलाकार आते हैं जिनका शुरुआती रिश्ता रंगमंच से रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल की लोकप्रिय रंगमंच शैली बॉलीवुड कलाकारों को खूब आकर्षित कर रही है। पूर्व में असरानी और शक्ति कपूर जैसे अभिनेता जात्रा में हिस्सा ले चुके हैं तो अब अभिनेत्री रवीना टंडन और मोनिका बेदी भी इसमें हाथ आजमा रही हैं।
Posted on 01 Aug 2011 by rang
लिखा हुआ इतिहास बनता है लेकिन हकीकत बन जाए तो ...
एक खबर किस तरह नाटक के लिए थीम दे सकती है, इसका उदाहरण है मेरा नाटक हरारत। वर्ष 2003 में एक खबर फाइल की थी लव स्टोरी-2003: पति-पति और किन्नर। इस खबर में एक ऐसे किन्नर की कहानी थी जिसने एक पुरुष से शादी रचाई लेकिन जब उसे लगा कि पुरुष को पत्नी के रूप में एक स्त्री की जरूरत है तो उसने खुद पहल करके उसकी शादी की। बीकानेर रेलवे स्टेशन से शुरू हुई यह प्रेम कहानी बिहार के गांव तक पहुंची और इस तरह एक खबर ने रूप लिया। - हरीश बी. शर्मा
Posted on 22 Jul 2011 by rang
मंच से गायब रंग
15 जुलाई 2004 को जब दर्जनभर मणिपुरी महिलाओं ने इम्फाल में असम राइफल्स मुख्यालय के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था, तब बहुतों के मन में यह बात उठी थी कि असम में जहाँ महिलाओं के संस्कार पूरी तरह से भारतीय हैं, उन्हें इस प्रदर्शन की प्रेरणा कहाँ से मिली? "हंस" से खुलासा हुआ है कि उन्हें इसकी प्रेरणा रंगमंच से मिली थी। सवाल यह है कि क्या हिन्दी रंगमंच हमारे समाज को इस तरह प्रभावित कर पाता है? क्या कभी कर सकता है? - अनहद
Posted on 12 Jul 2011 by rang
थियेटर ही हमेशा कम्युनिकेटर रहा है, फिल्म नहीं - प्रवीर गुहा
उम्र 64 वर्ष. ऊर्जा किसी युवा से भी ज्यादा. रंगकर्म में खास शैली, भाषायी प्रयोग और नये मुहावरे गढ़ने में महारत. मेनस्ट्रीम थियेटर को खारिज करनेवाले और पीपुल्स थियेटर के बड़े पैराकर प्रवीर गुहा को ‘साइकोफिजिकल’, ‘डायलॉग’, ‘जर्नी' थियेटर करना ज्यादा पसंद है. अमेरिका, यूरोप, जापान, हांगकांग, थाइलैंड, नेपाल, बांग्लादेश समेत भारत के कोने-कोने में इस शैली को लोकप्रिय बना चुके प्रवीर गुहा ने पीटर ब्रुक व ग्रोटोवस्की जेसे प्रसिद्ध रंगकर्मियों के साथ काम किया है.
प्रवीर गुहा से निराला की बातचीत.
Posted on 17 Jun 2011 by rang
ऑगस्टो बोल: जिन्होंने थियेटर से दुनिया को बदल डाला
दुनिया के रंगमंच पर कलाकार अपनी-अपनी भूमिका के अनुसार आते हैं और नेपथ्य में चले जाते हैं। 2 मई 2009 को विश्व के महानतम कलाकार और नाट्य निर्देशक ऑगस्टो बोल भी सदा-सदा के लिए नेपथ्य में चले गये। विश्व रंगमंच पर जब तक यह धरती रहेगी वे फिर कभी नहीं दिखेंगे, लेकिन उनके रंगमंचीय प्रयोग और ‘उत्पीड़ितों का रंगमंच’ का सिद्धांत हमेशा रंगमंच और इंसानी समाज को उनकी असाधारण भूमिका से उत्प्रेरित करता रहेगा।

- अश्विनी कुमार पंकज
Posted on 09 Jun 2011 by rang
नौसिखियों से जीवित है रंगकर्म
आज अभिनेताओं के लिए रंगमंच टेलिविजन व फिल्मों में प्रवेश पाने के लिए सीढ़ी मात्र बन गया है। आज अधिकांश कलाकारों में रंगमंच के प्रति न प्रेम है और न प्रतिबद्धता। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक, जिनके प्रशिक्षण के लिए सरकार खर्च करती है, नाट्य कर्म को छोड़ टेलिविजन और फिल्मों को प्राथमिकता देते हैं। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है रंगमंच की अभिवृद्धि के लिए पर वे बॉलिवुड में यश व धन कमाने की लालसा से भटक रहे हैं। कुछ सफल हो जाते हैं और ज्यादातर निराश होकर समय-समय पर रंगकर्म करते हैं। - दीवान सिंह बजेली
Posted on 07 Jun 2011 by rang
भास की समकालीन व्याख्या: रतन थियम से संगीता गुन्देचा की बातचीत
मणिपुर के रंग निर्देशक रतन थियम पारम्परिक संस्कृत नाटकों को उनकी आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है. उनका रंगकर्म अद्भुत रंग-संयोजन और अप्रतिम लय के कारण अनूठा है. वे नाट्यविद्या और उससे सम्बद्ध कला माध्यमों के विकास में विशेष रूप से सक्रिय रहे हैं. उन्होंने अनेक भारतीय एवं विदेशी नाटकों का मंचन करने के साथ-साथ भास के दो नाटकों, कर्णभारम्‌ और उरूभंगम्‌ का मंचन किया है.रतन थियम से यह संवाद भास के रूपकों की आधुनिक व्याख्याओं को जानने-समझने के लिए संगीता गुन्देचा ने किया है.
Posted on 02 Jun 2011 by rang

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रंगवार्ता एक सामूहिक प्रयास है. इसे 2004.2005 में अश्विनी पंकज और सचिन ने शुरू किया था. अब फिर से इस प्रयास को हम सभी साथी मिलजुलकर निरंतरता देने की कोशिश कर रहे हैं. आप भी इस प्रयास से जुड़ें.


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World Theatre Day Message 2011 by Jessica Kaahwa Uganda

Theatre in Service of Humanity

Have you ever imagined that theatre could be a powerful tool for peace and reconciliation? While nations spend colossal sums of money on peace-keeping missions in violent conflict areas of the world, little attention is given to theatre as a one-on-one alternative for conflict transformation and management. How can the citizens of mother-earth achieve universal peace when the instruments employed come from outside and seemingly repressive powers?

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