पुरस्कार तब मिला जब मैं थक गया हूं...
 मुझे यह पुरस्कार तब मिला है जब मैं थक कर बैठ गया हूं। इस सफर में कई दुश्वारियां आईं। देर आए लेकिन, दुरुस्त आए। यह कहना था कि रियासत के थियेटर खासकर लोक थियेटर में अपनी अलग पहचान रखने वाले मोती लाल खेमू का। पद्मश्री मिलने के बाद खेमू ने यह बातें कहीं। खेमू कश्मीरी थिएटर के सुपरिचित और बहुचर्चित नाम हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया से अंदाज लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाषायी संस्कृतिकर्मियों को किस तरह से उपेक्षित किया जाता रहा है।
Posted on 28 Jan 2012 by rang
गुरिल्ला स्त्रियों का छापामार थिएटर
 थिएटर के जरिए फासिस्ट ताकतों का मुकाबला करने वाले ब्रेख्त के बारे में बताने की जरूरत नहीं है जिन्होंने तानाशाह सैनिक शासन और रंगभेद के खिलाफ गुरिल्ला थिएटर किया। लेकिन नई सदी के इस पहले दशक में औरतों ने एक ऐसा थिएटर समूह बनाया है जो ब्रेख्त की तरह छापामार थिएटर कर रहा है। गुरिल्ला औरतों का यह थिएटर ब्रेख्त से इस मायने में भिन्न है कि जहां वे सिर्फ अपने देश में रंगमंच करते थे, वहीं ये पूरी दुनिया में घूम-घूमकर थिएटर कर रही हैं। अभिषेक कृष्ण
Posted on 08 Jan 2012 by rang
नेपथ्य में चला गया एक 'हरफनमौला'
 सोफोक्लीज द्वारा 442 ईसापूर्व के करीब लिखे गए ग्रीक दुखांत नाटक 'एंटीगॉन' का पूर्वाभ्यास शुरू हो चुका है। 'किंग क्रेऑन' की भूमिका निभाने वाले नसीरुद्दीन शाह अपनी भूमिका में तल्लीन हैं। रत्ना पाठक शाह भी रिहर्सल कर रही हैं जो एंटीगॉन का किरदार निभा रही हैं। अचानक एक कड़कती हुर्ई आवाज गूंजती है, 'आप स्टेज पर पति और पत्नी नहीं हैं। मत भूलिए कि आप दोनों चाचा-भतीजी की भूमिका निभा रहे हैं। आप दोनों को ज्यादा करीब नहीं होना चाहिए।' -वीनू संधू
Posted on 04 Jan 2012 by rang
एंजोय डर्टी पिक्चर, वी कांट टॉलरेट लौंडा
 इस 18 दिसंबर से भिखारी ठाकुर की 125वीं जयंती की शुरुआत हो रही है. यह समय ऐसा है जिसमें डर्टी विजुअलों की भरमार है चाहे माध्यम टीवी, सिनेमा, डिजिटल होर्डिंग, एलबम कुछ भी हो. इन सबके बीच नौटंकी, लौंडा नाच और इनके सिरमौर भिखारी ठाकुर की प्रासंगिकता क्या है? नचनिया-बजनिया और रंगकर्मी समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति व हैसियत ग्लोबल बाजार में कितनी है? - अश्विनी कुमार पंकज
Posted on 18 Dec 2011 by rang
रंगमंच के लिए छोड़ दी थी नौकरी
 वे एक मैगजीन में लेआउट आर्टिस्ट थे और रंगमंच के लिए उन्होंने नौकरी से रिजाइन किया था।
Posted on 16 Dec 2011 by rang
न्यू मीडिया पर छिड़ी जिरह
 गरीबी अमीरी की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। 80% लोगों के लिए सत्ताधारी वर्ग कोई जबावदेही नहीं महसूस करते।
Posted on 12 Dec 2011 by rang
रंगकर्म आजीविका और प्रसिद्धि दे सकता है : संजय उपाध्याय
 पिछले तीस सालों में पूरे परिदृश्य में काफी बदलाव आया है और अब वह वैश्विक हो गया है। नाटक के तत्व भी बदल गए हैं और सब कुछ डिजिटल हो गया है। आज थिएटर में पैसा भी मिलने लगा है जिसके बारे में हमलोगों ने कभी नहीं सोचा था। रंगमंच में अवधारणा और प्रतिबद्धता के स्तर पर भी बड़ा बदलाव देखने में आ रहा है। वह बाजार की तरफ उन्मुख हुआ है। बहुत से रंगकर्मी रंगकर्म के सहारे आजीविका जुटा पा रहे हैं। - संजय उपाध्याय
Posted on 12 Dec 2011 by rang
‘कहानी का रंगमंच’ की वर्गीय प्रस्तुति
 देवेन्द्र राज अंकुर का एक इंटरव्यू एनएसडी के रंगमंडल में कार्यरत और वहीं के प्रशिक्षित पुंज प्रकाश ने अपने ब्लॉग/फेसबुक पर पोस्ट किया है। यह इंटरव्यू वर्चुअल दुनिया में उस समय आया है जब एनएसडी के शशिभूषण की दूसरी पुण्यतिथि पर पटना में आयोजित स्मृति समारोह के दौरान लोगों ने फेसबुक पर तीखे सवाल उठाए हैं। न्याय की मांग कर रहे रंगकर्मियों और फेसबुक पर इस संदर्भ में उठे तीखे सवालों का क्या उपरोक्त पोस्ट से कोई सीधा संबंध है? - अश्विनी कुमार पंकज
Posted on 12 Nov 2011 by rang
त्वरित कॉफी, नूडल्स और रंगमंच
 आज रंगमंच की अवहेलना सांस्कृतिक शून्य को गहरा कर रही है। कभी-कभी सरकारें तुरंत ही निर्णय ले लेती हैं.
Posted on 15 Oct 2011 by rang
अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर इरोम चानु शर्मिला
 दक्षिण कोरिया के अंतरराष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव में इरोम चानु शर्मिला पर मंचित मूक नाटक को भरपूर प्रशंसा मिल रही है.
Posted on 15 Oct 2011 by rang
जिंदगी एक नाटक घर है
 पिता ट्रकों के जरिए माल ढुलाई का काम करते थे। बड़ा होने पर मैं भी उनके साथ इस काम में लग गया। इस सिलसिले में बंगलौर, मुंबई, सूरत, बड़ौदा हिंदुस्तान भर में कई जगह गया, लेकिन दिल हमेशा कागज-कलम में ही अटका रहा। वक्त के साथ जिंदगी को देखा, सोचा, समझा, कहानी, कविताओं, अफसानों मे ढाला। धीरे-धीरे रूझान नाटकों की ओर ज्यादा हुआ। लेखन के 48 साल के सफर में करीब 75-80 नाटक लिखे, जिनके 100 से भी ज्यादा शो हुए। - रिजवान जहीर उस्मान
Posted on 23 Sep 2011 by rang
एक नई मेनका का मंचन चैन्ने में भी
 विभा का विश्वास है कि थिएटर लोगों को शिक्षित और सुसंस्कृत बनाने का सर्वोत्तम तरीका है. इसके माध्यम से लोग अपने अपने जीवन व कार्यक्षेत्र के शीर्ष पर पहुँच सकते हैं.
Posted on 22 Aug 2011 by rang
"Pune-Highwat" by Rahul da Cunha
Posted on 08 Aug 2011 by rang
Play Spotlights Other Gandhi
 The most famous and revered of the Gandhis was the Mahatma. But there existed another before him, who dazzled the world briefly and then vanished into the annals of Indian history.
Posted on 08 Aug 2011 by rang
रंगमंच और साहित्य के सर्जक भीष्म साहनी
 भीष्म साहनी साहित्य की दुनिया के उन गिनेचुने नामों में हैं, जिन्होंने रंगमंच को नई उंचाई दी।
Posted on 08 Aug 2011 by rang
मेलबर्न 7 और नेड केली की दास्तान
 एक घंटे के नाटक का मंचन देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया. यह नाटक नेड की जिन्दगी पर फांसी स्थल पर होता है.
Posted on 08 Aug 2011 by rang
रंगमंच के माध्यम से
 गरीब बच्चों की जिंदगी में बदलाव लाने का माध्यम बना है रंगमंच. इसे साकार किया है चंडीगढ़ के थिएटर एज ने.
Posted on 08 Aug 2011 by rang
भोज और गंगू के बीच रंगकर्म
 भरत मुनि ने नाट्य को सभी कलाओं का संगम माना था. एक लंबी यात्रा के बाद हम फिर से आरंभ-बिंदु पर पहुंच गए हैं.
Posted on 08 Aug 2011 by rang
Shabana in Karnad's 'Broken Images'
Posted on 08 Aug 2011 by rang
शिवराम गुपचुप चला गया बिना कोई खबर दिये!
सफदर हाशमी की हत्या के बाद नुकक्ड़ नाटक आंदोलन का श्रैय उन्हीं को गिया गया। पर पूरे सत्तर दशक तक नुक्कड़ नाटक में शिवराम के अलावा कोई नहीं था हिंदी में। उत्तरार्द्ध में हर अंक में उनका नाटक छपना और उस नाटक की प्रस्तुतियां चालू हो जाना नियमित था। आज उत्तरार्ध संपादक सव्यसाची को कोई कामरेड याद नहीं करता। पर हम हिंदीभाषी युवाजन तो सव्यसाची के जरिए ही सत्तर के दशक में वामपंथी विचारधारा को जानते समझते थे। लगातार सक्रिय प्रतिबद्ध शिवराम से हमारी मुलाकात कोटा में उनके द्वारा आयोजित भूमिगत लेखक सम्मेलन में १९७६ में आपातकाल के दौरान हुई थी।
पिछले साल एक अक्टूबर 2010 को चर्चित रंगकर्मी शिवराम का निधन हुआ. पढ़िए पलाश विश्वास का यह संस्मरण
Posted on 08 Aug 2011 by rang
कोलकाता का हिंदी रंग इतिहास
 कोलकाता में हिन्दी नाट्य प्रस्तु्तियों का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है । 1906 में पहली बार मुंशी भृगुनाथ वर्मा के नेतृत्व में फूलकटरा में हिन्दी नाट्य समिति की स्थापना हुई ।
Posted on 08 Aug 2011 by rang
हिन्दी के चलते हिन्दी पेशेवर रंगमंच असंभव है
 जयशंकर प्रसाद मानते थे कि वे अवाम के स्तर तक नहीं जाएंगे, अवाम उन तक आये. आखिर गालिब ने यह क्यों नहीं कहा था और अवाम में उनकी पैठ प्रसाद से हजार गुना क्यों हुई? हिन्दी क्षेत्र में एक और रंगचर्या जनमी और अत्यधिक लोकप्रिय हुई और आज भी है- नौटंकी. नौटंकी उर्दू भाषा का रंगान्दोलन है और पारसी रंगमंच की तरह ही लोकप्रिय. इसका श्रेय भी उर्दू को जाएगा. हमें समझना होगा कि हिन्दी के चलते हिन्दी पेशेवर रंगमंच असंभव है. - मुद्राराक्षस
Posted on 08 Aug 2011 by rang
संस्कृति नाटक का सौन्दर्यशास्त्र
हमारे यहाँ नाटक और रंगमंच का उदय ही धार्मिक कृत्य, धार्मिक अनुष्ठान के रूप में हुआ था। इसलिए उसका स्वरुप अनुष्ठानपरक है। पूर्वरंग की सारी प्रक्रिया में एक सम्पूर्ण विधान है-प्रत्याहर से से लेकर प्ररोचना आदि तक इन्द्रध्वज आदि सारा विधान धार्मिक और अनुष्ठानपरक है इस अनुष्ठानिक वातावरण की सृष्टि कई नाट्यरूढ़ियों और धार्मिताओं के आधार पर की जाती है। नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने इसीलिए कहा है कि यह नाट्य तो ‘पंचमवेद’ है जिसमें कहीं धर्म है, कहीं क्रीड़ा, कहीं अर्थ, कहीं शान्ति...य़ह नाट्य-रस, भाव, कर्म तथा क्रियाओं के अभिनय द्वारा लोक में सबको उपदेश देने वाला है।
रंगमंच की जानी-मानी शख्सियत गिरीश रस्तोगी का महत्वपूर्ण आलेख
Posted on 02 Aug 2011 by rang
यह बंगाल के जात्रा रंगमंच का जादू है
 हिंदी रंगमंच क्या कभी बंगाल के ‘जात्रा’ रंगमंच की तरह पॉपुलर हो पाएगा? जब नामी-गिरामी कलाकार दर्शकों के लिए हिंदी रंगमंच पर उतरेंगे। वह भी चर्चित फिल्म सेलेब्रटिज और स्टार। हिंदी रंगमंच पर अभी तक वही फिल्मी कलाकार आते हैं जिनका शुरुआती रिश्ता रंगमंच से रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल की लोकप्रिय रंगमंच शैली बॉलीवुड कलाकारों को खूब आकर्षित कर रही है। पूर्व में असरानी और शक्ति कपूर जैसे अभिनेता जात्रा में हिस्सा ले चुके हैं तो अब अभिनेत्री रवीना टंडन और मोनिका बेदी भी इसमें हाथ आजमा रही हैं।
Posted on 01 Aug 2011 by rang
जयदेव तनेजा अकादमी पुरस्कार से सम्मानित
 नाटक के क्षेत्र में समग्र योगदान के लिए आलोचक जयदेव तनेजा को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
Posted on 24 Jul 2011 by rang
गंभीर शोध से खुलते रंगकर्म के आयाम
साहित्य, रंगमंच व कलाओं में शोध-कार्य के लिए जिस श्रम और अनुशीलन दृष्टि की दरकार होती है, उसका बहुधा अभाव दिखता है। ऐसे परिवेश में बांग्ला में प्रकाशित ‘अन्यधारार थियेटर उत्स थेके उजाने’ शीर्षक शोध प्रबंध नई उम्मीद की तरह है। कभी सुशील कुमार दे ने ‘बांग्ला प्रवादेर अभिदान’ या विनय घोष ने ‘पश्चिम बंगेर संस्कृति’ जैसे गंभीर ग्रंथ रचकर शोधार्थियों के सम्मुख एक नजीर पेश की थी। उसी तरह की गंभीर कृति संप्रति संध्या दे ने दी है। संध्या का यह शोध प्रबंध ढाई दशकों के शोध का परिणाम है।
बांग्ला रंगमंच के अध्ययन की जानकारी दे रही हैं बहुचर्चित लेखिका महाश्वेता देवी
Posted on 22 Jul 2011 by rang
लिखा हुआ इतिहास बनता है लेकिन हकीकत बन जाए तो ...
 एक खबर किस तरह नाटक के लिए थीम दे सकती है, इसका उदाहरण है मेरा नाटक हरारत। वर्ष 2003 में एक खबर फाइल की थी लव स्टोरी-2003: पति-पति और किन्नर। इस खबर में एक ऐसे किन्नर की कहानी थी जिसने एक पुरुष से शादी रचाई लेकिन जब उसे लगा कि पुरुष को पत्नी के रूप में एक स्त्री की जरूरत है तो उसने खुद पहल करके उसकी शादी की। बीकानेर रेलवे स्टेशन से शुरू हुई यह प्रेम कहानी बिहार के गांव तक पहुंची और इस तरह एक खबर ने रूप लिया। - हरीश बी. शर्मा
Posted on 22 Jul 2011 by rang
मंच से गायब रंग
 15 जुलाई 2004 को जब दर्जनभर मणिपुरी महिलाओं ने इम्फाल में असम राइफल्स मुख्यालय के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था, तब बहुतों के मन में यह बात उठी थी कि असम में जहाँ महिलाओं के संस्कार पूरी तरह से भारतीय हैं, उन्हें इस प्रदर्शन की प्रेरणा कहाँ से मिली? "हंस" से खुलासा हुआ है कि उन्हें इसकी प्रेरणा रंगमंच से मिली थी। सवाल यह है कि क्या हिन्दी रंगमंच हमारे समाज को इस तरह प्रभावित कर पाता है? क्या कभी कर सकता है? - अनहद
Posted on 12 Jul 2011 by rang
जरूरी सवाल पूछता ‘तमाशा न हुआ’
 दिल्ली में 28 से 30 जून तक भानु भारती लिखित-निर्देशित नाटक ‘तमाशा न हुआ’ का मंचन हुआ. नाटक पर प्रस्तुत है रंग समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी की टिप्पणी
Posted on 03 Jul 2011 by rang
मलयालम नाट्य साहित्य और रंगमंच
 केरल में अनेक नाट्यरूप प्रचलित रहे हैं तथापि नाटक साहित्य का विकास 19 वीं शताब्दी के अंत में ही हुआ.
Posted on 25 Jun 2011 by rang
रंगमंच उनका साहस है और बिदेसिया उनकी तान
वर्ष 2008 में जमशेदपुर के गोपाल मैदान में भोजपुरी लोकसंगीत का एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ था। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और अलग-अलग इलाके के करीब तीन-चार दर्जन नामी-गिरामी और कथित दिग्गज गायक कलाकारों का जमावड़ा लगा था। हजारों की संख्या में दर्शक-श्रोता भी पहुंचे थे। तभी एनाउंसमेंट हुआ कि चूंकि यह कार्यक्रम भिखारी ठाकुर को समर्पित है इसलिए इसकी शुरुआत उन्हीं के एक नाटक से होगी। आरा की पूनम सिंह व उनके साथी कलाकार प्रस्तुत करने जा रहे हैं प्रसिद्ध लोकनाटक – गबरघिचोर।
बिहार की इस खामोश महिला रंगकर्मी के बारे में बता रहे हैं निराला
Posted on 23 Jun 2011 by rang
थियेटर में उतार-चढ़ाव स्टॉक एक्सचेंज जैसा ही है
 मुश्किलों में भी थियेटर हो रहा है यही तो इसकी जीत है। 83 में मैने थियेटर शुरू किया था तब संघर्ष ज्यादा था।
Posted on 22 Jun 2011 by rang
Summer Theatre Festival, Kottayam
 Organised by the Abhinaya Theatre Research Centre in Kottayam.
Posted on 18 Jun 2011 by rang
आज भी फिल्मों में पारसी नाटक के तत्व
 हिन्दी फिल्में पश्चिमी रिएलिज्म से प्रभावित है लेकिन आज भी पारसी थियेटर की परंपरा कायम रखे हुए है.
Posted on 17 Jun 2011 by rang
हबीब दा से आखिरी बातचीत
 बाबा ने नाम रखा था हबीब अहमद। इस तरह पूरा नाम बनता था- हबीब अहमद युसुफजई खान तनवीर।
Posted on 17 Jun 2011 by rang
Strir Patro by Natyabhumi, Agartala
Posted on 17 Jun 2011 by rang
India’s Natyabhumi and Nepal’s Theatre Mandala appreciate Dhaka Intl’ theatre fest
Natyabhumi from Agartala staged their latest production “Stri’r Patro” on May 26 at the National Theatre Hall of the Bangladesh Shilpakala Academy during the ongoing 1st Dhaka International Theatre Fest. An adaptation of one of Rabindranath Tagore’s short stories and a tribute to Tagore’s 150th birth anniversary, the play has been dramatised and directed by Sanjoy Kar, the founding member of Natyabhumi from Agartala of Tripura.
by Syed Tashfin Chowdhury
Posted on 17 Jun 2011 by rang
थियेटर ही हमेशा कम्युनिकेटर रहा है, फिल्म नहीं - प्रवीर गुहा
 उम्र 64 वर्ष. ऊर्जा किसी युवा से भी ज्यादा. रंगकर्म में खास शैली, भाषायी प्रयोग और नये मुहावरे गढ़ने में महारत. मेनस्ट्रीम थियेटर को खारिज करनेवाले और पीपुल्स थियेटर के बड़े पैराकर प्रवीर गुहा को ‘साइकोफिजिकल’, ‘डायलॉग’, ‘जर्नी' थियेटर करना ज्यादा पसंद है. अमेरिका, यूरोप, जापान, हांगकांग, थाइलैंड, नेपाल, बांग्लादेश समेत भारत के कोने-कोने में इस शैली को लोकप्रिय बना चुके प्रवीर गुहा ने पीटर ब्रुक व ग्रोटोवस्की जेसे प्रसिद्ध रंगकर्मियों के साथ काम किया है. प्रवीर गुहा से निराला की बातचीत.
Posted on 17 Jun 2011 by rang
Eklavya Uvach by Satyabrata Rout
Posted on 10 Jun 2011 by rang
एक ‘‘भारतीय कलाकार’’ के न रहने का सूनापन
हुसैन की याद आते ही उनके साथ जुड़े विवाद चले आते हैं। ये विवाद क्यों हुए! उनके पीछे कौन था! क्या हुसैन को विवादों के बीच रहना अच्छा लगता था! ऐसे सभी प्रश्नों पर यह एक तथ्य भारी पड़ता है कि मकबूल फिदा हुसैन ने भारतीय कला जगत को नया आयाम दिया। वे हमारे समय के ऐसे कलाकार थे, जिसकी दृष्टि बेहद साफ थी। कला और समाज के रिश्तों से बेहद गहराई से वाकिफ हुसैन की पेंटिंग, समझ और दृष्टि उन्हें दूसरे चित्रकारों से कतार में आगे खड़ा करती है।
सचिन श्रीवास्तव याद कर रहे हैं विद्रोही रंगों के प्रयोगशील कलाकार को.
Posted on 10 Jun 2011 by rang
ऑगस्टो बोल: जिन्होंने थियेटर से दुनिया को बदल डाला
 दुनिया के रंगमंच पर कलाकार अपनी-अपनी भूमिका के अनुसार आते हैं और नेपथ्य में चले जाते हैं। 2 मई 2009 को विश्व के महानतम कलाकार और नाट्य निर्देशक ऑगस्टो बोल भी सदा-सदा के लिए नेपथ्य में चले गये। विश्व रंगमंच पर जब तक यह धरती रहेगी वे फिर कभी नहीं दिखेंगे, लेकिन उनके रंगमंचीय प्रयोग और ‘उत्पीड़ितों का रंगमंच’ का सिद्धांत हमेशा रंगमंच और इंसानी समाज को उनकी असाधारण भूमिका से उत्प्रेरित करता रहेगा। - अश्विनी कुमार पंकज
Posted on 09 Jun 2011 by rang
नौसिखियों से जीवित है रंगकर्म
 आज अभिनेताओं के लिए रंगमंच टेलिविजन व फिल्मों में प्रवेश पाने के लिए सीढ़ी मात्र बन गया है। आज अधिकांश कलाकारों में रंगमंच के प्रति न प्रेम है और न प्रतिबद्धता। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक, जिनके प्रशिक्षण के लिए सरकार खर्च करती है, नाट्य कर्म को छोड़ टेलिविजन और फिल्मों को प्राथमिकता देते हैं। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है रंगमंच की अभिवृद्धि के लिए पर वे बॉलिवुड में यश व धन कमाने की लालसा से भटक रहे हैं। कुछ सफल हो जाते हैं और ज्यादातर निराश होकर समय-समय पर रंगकर्म करते हैं। - दीवान सिंह बजेली
Posted on 07 Jun 2011 by rang
बादल सरकार पर अशोक भौमिक की किताब
 यह जानकर हैरानी होती है कि जिस नाटककार के शायद सबसे ज़्यादा नाटक हिंदी रंगमंच में खेले गये हैं, उसके अपने रंगकर्म को लेकर हिंदी में तो क्या, उसकी अपनी भाषा बांग्ला में भी कोई आलोचना पुस्तक आज तक सामने नहीं आयी। यदि थोड़ा-बहुत लेखन-प्रकाशन बांग्ला भाषा में हुआ भी है, तो पुस्तकों में छिट-पुट लेखों के रूप में ही मिलता है। ऐसे में हिंदी में प्रकाशित और अशोक भौमिक द्वारा लिखित, अनूदित, संपादित और संयोजित किताब बादल सरकार : व्यक्ति और रंगमंच का ज़ोरदार स्वागत किया जाना चाहिए।
Posted on 04 Jun 2011 by rang
Theatre of Opressed
Posted on 03 Jun 2011 by rang
Roop-Aroop by Tripurari Sharma
Posted on 03 Jun 2011 by rang
लोग हंस रहे हैं, जबकि उन्हें शर्म आनी चाहिए
 इक्कीसवीं सदी के दर्शक को यह नाटक ऐसे बर्बर समय में ले जाता है जहाँ महान भारतीय आदर्श और परम्पराएँ जमीन पर औंधे गिरी हैं.
Posted on 03 Jun 2011 by rang
मराठी रंगमंच का इतिहास
 'संगीत-नाटक' मराठी रंगमंच की एक महत्वपूर्ण देन है। नाट्यानंद, काव्यानंद, स्वरानंद का संगम अर्थात् 'नाट्यसंगीत'।
Posted on 03 Jun 2011 by rang
बादल दा कभी नेपथ्य में नहीं रहे
 बादल सरकार का 13 मई को कलकत्ता में निधन हो गया। उन पर वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक का आलेख.
Posted on 02 Jun 2011 by rang
रंगमंच पर स्त्री छवि
 19वीं शताब्दी में रंगमंच पर नटी बिनोदिनी को स्वीकार करना बहुत मुश्किल था, आज 147 साल बाद भी स्थिति वही है.
Posted on 02 Jun 2011 by rang
ऐसा नाटक लिखता हूं कि खुद हिल जाता हूं
 अगर दर्शक का दिमाग धक्का खाने के बजाय गुदगुदी हासिल करता है तो इसका मतलब है कि उसमें पहले से ही कुंठाएं भरी हुई हैं।
Posted on 02 Jun 2011 by rang
भास की समकालीन व्याख्या: रतन थियम से संगीता गुन्देचा की बातचीत
 मणिपुर के रंग निर्देशक रतन थियम पारम्परिक संस्कृत नाटकों को उनकी आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है. उनका रंगकर्म अद्भुत रंग-संयोजन और अप्रतिम लय के कारण अनूठा है. वे नाट्यविद्या और उससे सम्बद्ध कला माध्यमों के विकास में विशेष रूप से सक्रिय रहे हैं. उन्होंने अनेक भारतीय एवं विदेशी नाटकों का मंचन करने के साथ-साथ भास के दो नाटकों, कर्णभारम् और उरूभंगम् का मंचन किया है.रतन थियम से यह संवाद भास के रूपकों की आधुनिक व्याख्याओं को जानने-समझने के लिए संगीता गुन्देचा ने किया है.
Posted on 02 Jun 2011 by rang
बिहार में रंगमंच
बिहार में रंगमंच लंबे समय से संकट के दौर से गुजर रहा है। पटना, आरा, गया, बेगूसराय, मधुबनी, कटिहार एवं सहरसा, के अलावा मसौढ़ी जैसे एकाघ शहर व कस्बे ही ऐसे हैं जहाँ नियमित रंगमंच हो रहा है। बिहार जैसे पिछड़े समाज में भी रंगमंच, विषेषकर पिछले दो-तीन दषकों से, अपनी स्थायी जगह बनाता जा रहा है। तमाम कठिनाईयों व दुष्वारियों के बावजूद रंगमंच हो रहा है। बगैर राज्य के समर्थन के, बगैर समाज के सहयोग के, हर वर्ष बड़ी संख्या में रंगकर्मियों के पलायन के बावजूद बिहार में नाटक निरंतर किया जा रहा है। नाटकों के महोत्सव आयोजित हो रहे हैं। रंगकर्मी अनीश अंकुर का आलेख
Posted on 02 Jun 2011 by rang
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