RANGVARTA : an e-magazine for Indian Theatre back to main stage |
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गरीबी अमीरी की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। 80% लोगों के लिए सत्ताधारी वर्ग कोई जबावदेही नहीं महसूस करते।Posted on 12 Dec 2011 by rang
आज रंगमंच की अवहेलना सांस्कृतिक शून्य को गहरा कर रही है। कभी-कभी सरकारें तुरंत ही निर्णय ले लेती हैं.Posted on 15 Oct 2011 by rang
भरत मुनि ने नाट्य को सभी कलाओं का संगम माना था. एक लंबी यात्रा के बाद हम फिर से आरंभ-बिंदु पर पहुंच गए हैं.Posted on 08 Aug 2011 by rang
बादल सरकार का 13 मई को कलकत्ता में निधन हो गया। उन पर वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक का आलेख.Posted on 02 Jun 2011 by rang
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दक्षिण कोरिया के अंतरराष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव में इरोम चानु शर्मिला पर मंचित मूक नाटक को भरपूर प्रशंसा मिल रही है.Posted on 15 Oct 2011 by rang
गरीब बच्चों की जिंदगी में बदलाव लाने का माध्यम बना है रंगमंच. इसे साकार किया है चंडीगढ़ के थिएटर एज ने.Posted on 08 Aug 2011 by rang
बाबा ने नाम रखा था हबीब अहमद। इस तरह पूरा नाम बनता था- हबीब अहमद युसुफजई खान तनवीर।Posted on 17 Jun 2011 by rang
19वीं शताब्दी में रंगमंच पर नटी बिनोदिनी को स्वीकार करना बहुत मुश्किल था, आज 147 साल बाद भी स्थिति वही है.Posted on 02 Jun 2011 by rang
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वे एक मैगजीन में लेआउट आर्टिस्ट थे और रंगमंच के लिए उन्होंने नौकरी से रिजाइन किया था। Posted on 16 Dec 2011 by rang
भीष्म साहनी साहित्य की दुनिया के उन गिनेचुने नामों में हैं, जिन्होंने रंगमंच को नई उंचाई दी। Posted on 08 Aug 2011 by rang
मुश्किलों में भी थियेटर हो रहा है यही तो इसकी जीत है। 83 में मैने थियेटर शुरू किया था तब संघर्ष ज्यादा था।Posted on 22 Jun 2011 by rang
अगर दर्शक का दिमाग धक्का खाने के बजाय गुदगुदी हासिल करता है तो इसका मतलब है कि उसमें पहले से ही कुंठाएं भरी हुई हैं।Posted on 02 Jun 2011 by rang
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एक घंटे के नाटक का मंचन देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया. यह नाटक नेड की जिन्दगी पर फांसी स्थल पर होता है.
नाटक के क्षेत्र में समग्र योगदान के लिए आलोचक जयदेव तनेजा को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
हिन्दी फिल्में पश्चिमी रिएलिज्म से प्रभावित है लेकिन आज भी पारसी थियेटर की परंपरा कायम रखे हुए है.
गरीबी अमीरी की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। 80% लोगों के लिए सत्ताधारी वर्ग कोई जबावदेही नहीं महसूस करते।
बादल सरकार का 13 मई को कलकत्ता में निधन हो गया। उन पर वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक का आलेख.
दक्षिण कोरिया के अंतरराष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव में इरोम चानु शर्मिला पर मंचित मूक नाटक को भरपूर प्रशंसा मिल रही है.
गरीब बच्चों की जिंदगी में बदलाव लाने का माध्यम बना है रंगमंच. इसे साकार किया है चंडीगढ़ के थिएटर एज ने.
बाबा ने नाम रखा था हबीब अहमद। इस तरह पूरा नाम बनता था- हबीब अहमद युसुफजई खान तनवीर।
19वीं शताब्दी में रंगमंच पर नटी बिनोदिनी को स्वीकार करना बहुत मुश्किल था, आज 147 साल बाद भी स्थिति वही है.
वे एक मैगजीन में लेआउट आर्टिस्ट थे और रंगमंच के लिए उन्होंने नौकरी से रिजाइन किया था।
भीष्म साहनी साहित्य की दुनिया के उन गिनेचुने नामों में हैं, जिन्होंने रंगमंच को नई उंचाई दी।
मुश्किलों में भी थियेटर हो रहा है यही तो इसकी जीत है। 83 में मैने थियेटर शुरू किया था तब संघर्ष ज्यादा था।
अगर दर्शक का दिमाग धक्का खाने के बजाय गुदगुदी हासिल करता है तो इसका मतलब है कि उसमें पहले से ही कुंठाएं भरी हुई हैं।











